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E-ISSN: 2582-8010
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Volume 6 Issue 4
April 2025
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पूँजीवाद की शुरूआत एक विषय के रूप में
Author(s) | चन्द्रप्रकाश कारपेंटर |
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Country | India |
Abstract | परिचय - यूरोप में पूँजीवादी व्यवस्था के उदय के लक्षण पन्द्रहवीं सदी के उत्तरार्द्ध में दिखलाई देने पड़ गये थे। इस व्यवस्था को उत्पादन प्रविधियों तथा संगठन की उन्नति ने जन्म दिया। लोहे के उत्पादन का बढ़ना इस प्रक्रिया का एक महत्त्वपूर्ण कारण माना जाता है। सोने, चाँदी, ताँबे, टीन और सीसे जैसी मूल्यवान धातुओं का उत्पादन भी बढ़ने लगा। इसके मूल में भी खनन प्रविधियों में सुधार आना था। इसी समय में जलचलित मशीनों और पनचरखी का आविष्कार हुआ। नयी खोजों और आविष्कारों ने पन्द्रहवीं सदी के अन्त से लेकर सत्रहवीं शताब्दी के अन्त तक की महान् भौगोलिक खोजों का मार्ग प्रशस्त किया। नये देशों को खोजा गया। वहाँ उपनिवेश बसाये गये। एशियाई देशों के साथ व्यापारिक सम्पर्क पुनः स्थापित हुआ। इन सबके परिणामस्वरूप निर्यात की जाने वाली वस्तुओं की माँग बढ़ी। बड़े पैमाने पर उत्पादन की आवश्यकता अनुभव की गई। परन्तु मध्ययुगीन उद्योग के संगठनात्मक स्वरूप ऐसे नहीं थे कि आविष्कारों या सुधारों को प्रोत्साहित करते। फिर भी, इस दिशा में आगे कदम बढ़ाया गया। उत्पादन प्रक्रियाओं का कई अलग-अलग कार्यों अथवा प्रक्रियाओं में विभाजन किया गया, जिनमें से प्रत्येक को अब तक एक अलग श्रेणी (गिल्ड) पूरा करती थी। जैसेकि वस्त्र उद्योग में बुनकरों, कातने वालों, रंगसाजों आदि की श्रेणियाँ स्थापित हो गई। अर्थात् वस्त्र उद्योग में श्रम का विभाजन हो गया। यह पूँजीवाद की दिशा में उठाया गया कदम था। अन्य परिवर्तनों का योगदान इसी के साथ-साथ दूसरे परिवर्तन भी दृष्टिगत होने लगे थे। अब कुछ अधिक सम्पन्न व्यापारी एक या दो श्रेणियों से उनका माल थोक में खरीदने लगे और उसे जहाँ उसकी माँग होती थी, बेचने की व्यवस्था भी करने लगे। इससे उन्हें मुनाफा होने लगा। तब उन्होंने धीरे-धीरे कच्चे मालों और श्रम-साधनों को खरीदना शुरू कर दिया और श्रेणी सदस्य उन पर आश्रित होने लगे। व्यापारी लोग दस्तकारों को कच्चे माल और औजार-चरखे, करघे, रंग आदि उपलब्ध कराने लगे। उन्हें उनके काम के लिये यथासम्भव कम से कम परिश्रमिक देते और उनके द्वारा बनायी चीजों को अधिक से अधिक कीमत पर बेचने का प्रयास करते। अर्थात् व्यापारी वर्ग कारीगरों को उत्पादन में उनके द्वारा लगाये गये श्रम के केवल कुछ भाग की कीमत चुका कर शेष पैसा अपने लिये रख लेता था। बाजार में बेचा गया तैयार माल व्यापारी वर्ग को मुनाफा या लाभ देता है; जबकि व्यापारी वर्ग उत्पादन में किसी प्रकार का श्रम नहीं करता। वह दूसरे के श्रम तथा अपनी पूँजी के सहारे श्रम करने वालों से कहीं अधिक मुनाफा कमा लेता है। ऐसा उद्यमकर्त्ता पूँजीपति कहलाता है। इस प्रकार, पूँजीवाद का आधार है; अधिक मुनाफा प्राप्त करने के लिये बड़े पैमाने पर उत्पादन और उत्पादन के साधनों- पूँजी एवं उपकरण पर व्यक्तिगत स्वामित्व। उत्पादन करने वाले श्रमिक को मात्र कुछ वेतन अथवा पारिश्रमिक से ही सन्तोष करना पड़ता है। उसके द्वारा तैयार की गई वस्तुओं पर उसका कोई स्वामित्व नहीं होता। प्रोफेसर अ.ज. मानफ्रेद के शब्दों में, "उद्यमकर्ता कारीगरों को उत्पादन में उनके द्वारा लगाये श्रम के केवल कुछ भाग के लिये ही देकर शेष पैसा अपने लिये रख लेते थे। उद्यमकर्त्ता इस प्रकार जिस श्रम को चुरा लेता है; वह अतिरिक्त या बेशी श्रम कहलाता है। बेशी श्रम द्वारा उत्पादित और बाद में बाजार में बेचा गया तैयार माल उद्यमकर्त्ता को अतिरिक्त मूल्य, अर्थात् मुनाफा या लाभ देता है।... उद्यमकर्त्ता दस्तकारों और ग्रामीण कारीगरों के काम में जो धन लगाता है, वह पूँजी-बेशी मूल्य लाने वाला धन कहलाता है और स्वयं इस तरह का उद्यमकर्त्ता पूँजीपति कहलाता है। बेशी मूल्य पूँजीवादी उत्पादन प्रणाली का एक आवश्यक लक्षण है। यही वह लक्ष्य है, जिसकी तरफ पूँजीपति का समस्त कार्यकलाप निर्देशित होता है। पूँजीवाद की प्रारम्भि अवस्था में पूँजीपति अलग-अलग उत्पादकों से उनका तैयार माल खरीदकर बेचा करता था। फिर उसने कारीगरों को कच्चा माल और औजार उधार देना शुरू किया और यह शर्त रखी कि वे अपना उत्पाद सिर्फ उसी को बेचेंगे। इसके बाद वे उत्पादन के अधीक्षण में प्रत्यक्ष भाग लेने लगे। अब वे किसी विशेष इमारत या स्थान पर अपनी देखरेख में उत्पादकों से काम कराने लगे। यह कारखाना अथवा फैक्टरी व्यवस्था का प्रारम्भिक स्वरूप था, जहाँ कारीगर लोग छोटे-बड़े औजारों की सहायता से अपने हाथ से काम करते थे और उद्यमकर्त्ता समूचे काम पर निगरानी रखता था। इनमें काम करने वाले कारीगर एक प्रकार से श्रमिक हीं थे जो अपने श्रम को बेचकर अपनी जीविका चलाते थे। मुनाफा तो पूँजीपति की जेब में चला जाता था। मुनाफे की भूख ही पूँजीपति की प्रेरक शक्ति थी वह हर समय अधिक से अधिक मुनाफा प्राप्त करने तथा मुनाफे की राशि को पुनः निवेश करने के उचित अथवा अनुचित साधनों की खोज में लगा रहता था। अधिक मुनाफा कमाने के लिये अधिक उत्पादन करना जरूरी था। अतः उपकरणों अथवा औजारों को उन्नत किस्म का बनाया जाने लगा। ज्यों-ज्यों अच्छी किस्म के औजार श्रमिकों के हाथ में आने लगे, त्यों-त्यों कम समय में अधिक उत्पादन होने लगा। चूँकि पूँजीवादी व्यवस्था में प्रारम्भ से ही प्रतिस्पर्धा रही इसलिए उत्पादन प्रणाली सदा उत्पादन साधनों में महत्त्वपूर्ण सुधारों और उत्पादन प्रविधियों में क्रान्ति के साथ जुड़ी रही है। इसकी वजह से ही मशीनों का निर्माण सम्भव हो पाया और आधुनिक फैक्टरी व्यवस्था अस्तित्व में आ पाई। |
Keywords | . |
Field | Arts |
Published In | Volume 6, Issue 3, March 2025 |
Published On | 2025-03-08 |
Cite This | पूँजीवाद की शुरूआत एक विषय के रूप में - चन्द्रप्रकाश कारपेंटर - IJLRP Volume 6, Issue 3, March 2025. |
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10.70528/IJLRP
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